समझदार बच्चा
कभी चाँद को रोटी समझने वाला बच्चा
अब समझदार हो गया है
वह जानता है रोटी, रोटी है
चाँद नहीं
वह यह भी जानता है
अच्छी तरह
की मेहनत करे बिना रोज
रात को चाँद दिख सकता है
रोटी नहीं
और शायद इसी लिए
रात को चाँद देखने के बदले
वह काम करता है
तभी पाता है
सुबह-सुबह रोटी,भरपेट
-- दिलीप लोकरे
रविवार, 18 जुलाई 2010
रविवार, 4 जुलाई 2010
चिड़िया और आदमी
चिड़िया और आदमी
हाल ही में बनाये
बड़े बंगले से
माँ की ही तरह
चिड़िया को भी
बाहर निकाल दिया मैंने,
माँ
जिसने मुझे जीवन दिया
अपना दूध पिलाया
चलना सिखाया
हर मुश्किल में
साथ निभाया,
और चिड़िया
जिसने बिना थके
बिना हारे
मेहनत से
अपना नीड़
बनाना सिखाया
....क्या करू
चिड़िया नहीं
आदमी हू
मै.......!
-दिलीप लोकरे
हाल ही में बनाये
बड़े बंगले से
माँ की ही तरह
चिड़िया को भी
बाहर निकाल दिया मैंने,
माँ
जिसने मुझे जीवन दिया
अपना दूध पिलाया
चलना सिखाया
हर मुश्किल में
साथ निभाया,
और चिड़िया
जिसने बिना थके
बिना हारे
मेहनत से
अपना नीड़
बनाना सिखाया
....क्या करू
चिड़िया नहीं
आदमी हू
मै.......!
-दिलीप लोकरे
शुक्रवार, 11 जून 2010
कविता

ज़माना बदल गया
पिछली बरसात में इन्द्रधनुष नहीं देखा मैंने
कोयल भी कूकी नहीं पूरे वसंत में
सावन की फुहारों को तरसे पेड़ो पर लगे झूले
कड़कती बिजली क्यों ग़ायब रही अनंत में ?
मेघ संदेसा ले जाने से डरते रहे प्रियतम का
बच्चे हाथों में लिए बैठे रहे कागज़ की नाव
नदियाँ ख़ाली ही रही अंतस तक अपने
बाढ़ से डूबे नहीं शहर से लगे गाँव
आषाढ़ तरसता रहा पहली बारिश के लिए
भादो ढूँढता रहा पेड़ो की छाव
भुट्टे सेंकने नहीं आया कोई ठेले पर
मोर भी नाचा नहीं मिट्टी के ढेले पर
होता नहीं क्यों ऐसा
सोचते है हम जैसा
हम तो है वैसे ही
शायद जमाना बदल गया है !
-दिलीप लोकरे
रविवार, 16 मई 2010
शनिवार, 8 मई 2010
Mothers Day

कहाँ गई वो माँ ?
चूल्हे पर सिकी रोटी कि गंध में
आँगन बुहारने पर धूल कि धुन्द में
त्योहारों पर बनी रंगोली के रंग में
पहले-पहले दिन स्कूल जाति संग में
किसी गलती पर मुझे पीट कर खुद आंसू बहाती
कहाँ गई वो माँ ?
रात को डरने पर आँचल की छाँव में
गलती करने पर डांट के भाव में
गरमी कि छुट्टी में मामा के गाँव में
छुक-छुक गाड़ी कि भीड़-भाड़ में
पीतल के लोटे से पानी पिलाती
कहाँ गई वो माँ ?
गाँव के टीले पे
मंदिर के मेले में
कागज की फिरकनी मुझे दिलाती
कोने के ठेले पे
बरफ के गोले पे
रंगों की चाशनी ज्यादा डलाती
खुद न खा कर मुझे खिलाती
कहाँ गई वो माँ ?
चूल्हे पर सिकी रोटी कि गंध में
आँगन बुहारने पर धूल कि धुन्द में
त्योहारों पर बनी रंगोली के रंग में
पहले-पहले दिन स्कूल जाति संग में
किसी गलती पर मुझे पीट कर खुद आंसू बहाती
कहाँ गई वो माँ ?
रात को डरने पर आँचल की छाँव में
गलती करने पर डांट के भाव में
गरमी कि छुट्टी में मामा के गाँव में
छुक-छुक गाड़ी कि भीड़-भाड़ में
पीतल के लोटे से पानी पिलाती
कहाँ गई वो माँ ?
गाँव के टीले पे
मंदिर के मेले में
कागज की फिरकनी मुझे दिलाती
कोने के ठेले पे
बरफ के गोले पे
रंगों की चाशनी ज्यादा डलाती
खुद न खा कर मुझे खिलाती
कहाँ गई वो माँ ?
. दिलीप लोकरे
गुरुवार, 6 मई 2010
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