रोज की आपाधापी भरी जिंदगी में हम अकसर यह उम्मीद करते है कि हमें सारी वह सुविधाए मिले जो मिलनी चाहिए , लेकिन उन सुविधाओ कि चाह में अपने कर्त्तव्य भूल जाते हैं । हमारी सुविधा यदि दूसरे कि असुविधा होती हो तो हमें अपने कर्तव्य का बोध भी होना ही चाहिए .
हवा जो साथ चल रही है /तो समझो बात चल रही है / जो कल तक थी फासले से /वो थामे हाथ चल रही है / वहां डूबें हैं कुछ मंजर /वहीं भीगे हैं कुछ सपने इन आँखों में गज़ब सूखा /वहां बरसात चल रही है / मुझे अपने भी मिलते हैं /तो रखता फासले दरम्यां/ किसी का अब भरोसा क्या / अभी तो घात चल रही है / भरी दोपहर में दिखते है / यहाँ साये अँधेरे के / कभी फुरसत में आ जाना / अभी तो रात चल रही है/ तुम्हारे घर मै पंहुचा था /की जानु इस सच्चाई को / है सचमुच इश्क मुझसे /या खुराफ़ातचल रही है / o दिलीप लोकरे